
चन्दौली- उत्तर प्रदेश आदिवासी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. उमेश चन्द्र ने आयोजित प्रेस वार्ता में बताया कि दिनांक 9 अगस्त को पूरे देश में विश्व आदिवासी दिवस, आदिवासी समाज की पहचान, संस्कृति, गौरवशाली विरासत, सम्मान और अधिकारों के उत्सव के रूप में मनाया गया लेकिन आदिवासी कल्याण और सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावे करने वाली भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने इस महत्वपूर्ण अवसर पर आदिवासी समाज को बधाई देना तक जरूरी नहीं समझा। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जनजाति कार्य मंत्री जुएल ओंराव ने विश्व आदिवासी दिवस पर आदिवासी समाज को बधाई नहीं दी । इतना ही नहीं बीजेपी के 25 आदिवासी सांसदों में से 20 सांसदों ने भी विश्व आदिवासी दिवस पर अपने ही समाज को बधाई देना जरूरी नहीं समझा।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस, राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, असम के मुख्यमंत्री हेमंत विस्वसर्मा और गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने भी आदिवासी समाज को इस महत्वपूर्ण दिवस पर बधाई नहीं दी। ‘शेर दिवस’ पर बधाई सन्देश देने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मा. योगी आदित्यनाथ ने भी आदिवासी समाज को इस अवसर पर बधाई नहीं दी। आश्चर्य की बात यह है कि उत्तर प्रदेश में अखिल भारतीय गोंड आदिवासी संघ जिसके संरक्षक मा. फगन सिंह कुलस्ते जी हैं, इस संगठन में पूरे उत्तर प्रदेश के अधिकांश सदस्य भारतीय जनता पार्टी के अनुसूचित जनजाति मोर्चा से संबंध रखते हैं; इस संगठन ने अपने प्रदेश अध्यक्ष विधायक (रामकोला) विनय प्रकाश गोंड, सांसद (बहराइच) डॉ आनंद कुमार गोंड , पूर्व सांसद (बहराइच) अक्षयवर लाल गोंड जी (सभी भाजपा से हैं) के नेतृत्व में लखनऊ में आदिवासी दिवस मनाने के लिए हजारों की भीड़ का प्रबंधन भा.ज.पा. अनुसूचित जनजाति मोर्चा ने किया, लेकिन मुख्य अतिथि पद की सहमति देने के बाद भी उप-मुख्यमंत्री मा. केशव प्रसाद मौर्या जी ने इस कार्यक्रम में शामिल होना उचित नहीं समझा। माननीय मुख्यमंत्री जी ने पहले से ही समय का आभाव बता दिया था। यह उत्तर प्रदेश के आदिवासी समाज की निश्चित रूप से उपेक्षा है, समय देकर भी उपस्थित न होना यह दर्शाता है कि उत्तर प्रदेश में आदिवासी समाज की कोई अहमियत नहीं है,कोई सम्मान नहीं है।
यह केवल बधाई देने या ना देने का प्रश्न नहीं है, सवाल उस राजनीतिक सोच का है जिसमें भाजपा को आदिवासी समाज की याद केवल चुनाव के समय आती है जब उसे उनके वोट चाहिए होते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही आदिवासियों की पहचान सम्मान और अधिकार उनके राजनीतिक विमर्श से गायब हो जाते हैं। एक ओर भाजपा सरकार में आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन, रोजगार, शिक्षा और संवैधानिक अधिकारों पर लगातार प्रहार हो रहे हैं वहीं दूसरी ओर उनके मूल पहचान को कमजोर कर उन्हें वनवासी के रूप में परिभाषित करने का वैचारिक प्रयास किया जा रहा है।
यह केवल नाम का सवाल नहीं है बल्कि आदिवासी समाज के ऐतिहासिक पहचान, अस्मिता, स्वाभिमान और अधिकारों को मिटाने की साजिश है। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेता केंद्रीय जनजाति कार्य मंत्री और भाजपा के अधिकांश आदिवासी सांसद विश्व आदिवासी दिवस पर आदिवासी समाज को बधाई देना तक जरूरी नहीं समझते तो उनसे आदिवासियों के जल-जंगल और जमीन की रक्षा, आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा, आदिवासी क्षेत्र के विकास, आदिवासी युवाओं के रोजगार, आदिवासी बच्चों की बेहतर शिक्षा आदिवासी बहनों की सुरक्षा की क्या ही अपेक्षा की जा सकती है ।
आज पूरा देश देख रहा है कि आदिवासी सम्मान और कल्याण के बड़े-बड़े दावों और करोड़ों के प्रचार के पीछे भारतीय जनता पार्टी की वास्तविक मानसिकता क्या है । आदिवासियों से वोट मांगने में भाजपा सबसे आगे रहती है, वह जनजाति गौरव दिवस मनाती है, लेकिन विश्व आदिवासी दिवस पर उन्ही आदिवासियों को शुभकामनाएं देना तक जरूरी नहीं समझती। यही भाजपा के आदिवासी प्रेम की असर सच्चाई है।
प्रेस वार्ता में प्रदेश महासचिव संजीव गौड़, कुन्दन खरवार, प्रदेश सचिव आलोक गोंड, जिलाध्यक्ष बृजेश कुमार गोंड, दिनेश कुमार गोंड, विनोद सिंह, श्याम नारायण जी, कृष्ण गोंड, गुरू प्रसाद आदि लोग सम्मिलित रहे।