
कंन्दवा चन्दौली। शिव मंदिर कन्दवा के प्रांगण में चल रहे तीन दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा के तृतीय दिवस में काशी से पधारे विद्वान डॉक्टर बृजेशमणि पाण्डेयजी ने कथा का वर्णन करते हुए बताया कि महाराज जनक की धनुष यज्ञशाला में विराजमान प्रभु श्रीराम को अपनी-अपनी नजर से विभिन्न देशों से आए हुए राजा गणों ने तथा वेश बदलकर बैठे हुए राक्षसों ने देखा किंतु वास्तविकता को कोई भी न जान सका- जिन्हके रही भावना जैसी।प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।। संपूर्ण सभा के व्यवस्थित रूप में बैठ जाने के बाद विदेह राज नंदिनी श्री किशोरी जी का अपनी सखियों के साथ में आगमन हुआ उनके अनुपम सौंदर्य को देख करके समस्त नर नारि मोहित हो गए-
रण भूमि जब सिय पगु धारी।
देखि रूप मोहे नर नारी।।सीता के सौंदर्य की तुलना करते हुए संत शिरोमणि तुलसी दास जी ने बहुत सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लिखा कि-
यदि सौंदर्य रुपी अमृत का सागर हो अति सुंदर संपन्न कच्छप हो। स्वयं कामदेव के द्वारा मंथन किया जाए। शोभा की रस्सी हो श्रृंगार रस का मंदराचल पर्वत हो स्वयं कामदेव मंथन का काम करें। इस प्रकार सौंदर्य रूपी अमृत के साथ से उत्पन्न जो लक्ष्मी होगी वह लक्ष्मी थोड़ी बहुत सीता के समान हो सकती है-
तदपि संकोच समेत कवि कहहि सीय सम तुल। महाराज जनक के बंदी जनों के द्वारा पूर्व निर्धारित घोषणा की गई सभी दुष्ट राजाओं ने अपने-अपने सामर्थ्य का हर तरह से प्रयोग किया किंतु शिव धनुष टस से मस नहीं हुई-
डगै न शंभु सरासन कैसे।
कामी वचन सती मन जैसे।।
अंततः महाराज जनक के द्वारा यह घोषणा की गई की धरती पर कोई वीर नहीं है। महाराज जनक के इस घोषणा को सुनते ही राजकुमार लक्ष्मण वीरोचित उत्साह से भरकर कहने लगे की जहां रघुवंश का कोई राजकुमार हो ऐसी सभा को वीर विहीन कहना हर तरह से अनुचित है लक्ष्मण के इस उद्घोष के अनन्तर मुनि विश्वामित्र की आज्ञा से प्रभु श्रीराम अति सहजता पूर्वक खड़े हुए और धनुष के पास जैसे ही पहुंचे जनकपुर वासी लोग माता सुनैना श्री सीता जी सभी लोग भविष्य की चिंता करते हुए तमाम तरह की कल्पना करने लगे सबकी चिंता को दूर करते हुए अहंकार के प्रतीक शिव की धनुष को महाराज जनक की सभा में प्रभु श्रीराम के द्वारा तोड़ा गया।
तेहि क्षण राम मध्य धनु तोरा।
भरे भुवन धुनि घोर कठोरा।।
अंततः प्रभु श्रीराम के गले में किशोरी जी के द्वारा जयमाल डाल दिया गया।
रघुवर उर जयमाल।
देखि देव बरसहि सुमन।।
कथा श्रवण करने वालों में सर्वश्री अच्युतानंद त्रिपाठी, सोभनाथ राय,वीरेंद्र, जगत नारायण सिंह, संजय द्विवेदी, श्रीमती शीला, मंजू,पूनम, आयुषी मिश्रा, विमलेश त्रिपाठी, आदि।
