
चकिया(चन्दौली)- पर्यावरण प्रेमियों व वनों से मित्रता रखने वाले लोगो के लिए आज का दिन काफी खास और यादगार है।ऐसे ही एक पर्यावरण प्रेमी वृक्ष बंधु,वन बंधु,गंगा हरीतिमा व जनपद के वन क्षेत्रों को हरा भरा रखने का संकल्प लिए परसुराम से जब आज के हालात पर पूछा गया तो उनकी आंखें नम होगयी। उन्होंने कहा कि हमारी धरती, हमारे जंगल, हमारी नदियां सिर्फ साधन नहीं बल्कि हमारे जीवन का आधार है। चिपको आन्दोलन हमें वह सिखाता है कि जब आम लोग जागते हैं तो प्रकृति की रक्षा एक जन शक्ति बन जाती है।
इस आन्दोगन की मूल भावना थी प्रकृति की रक्षा, जीवन की रक्षा। साथ ही वृक्ष कटाई के विरोध के माध्यम से पर्यावरण का संरक्षण भी होता रहे।
चिपको आंदोलन 1970 के दशक में उत्तराखंड जब उत्तर प्रदेश हुआ करता था वह के ग्रामीण निवासियों, विशेषकर महिलाओं द्वारा वनों की कटाई रोकने के लिए चलाया गया एक अहिंसक जन-आंदोलन था। इसमें प्रदर्शनकारी पेड़ों को लिपट कर उन्हें कटने से बचाते थे। जिससे यह पर्यावरण संरक्षण का एक शक्तिशाली प्रतीक बन गया। इस आंदोलन की शुरुआत 1973 में चमोली जिले से हुई, जिसे सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट और गौरा देवी जैसे नेताओं ने आगे बढ़ाया।इस उद्देश्य व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए सरकारी ठेकेदारों द्वारा वनों के विनाश को रोकना और स्थानीय लोगों का जल, जंगल व जमीन पर अधिकार सुनिश्चित करना था। इस लिए जब ठेकेदार पेड़ काटने आते थे, तो महिलाएं और ग्रामीण पेड़ों से चिपक जाते थे।इस आंदोलन के कारण हिमालयी क्षेत्र में वन कटाई पर प्रतिबंध लगा और यह भारत की प्रमुख पर्यावरण नीतियों जैसे वन संरक्षण अधिनियम के निर्माण में मददगार साबित हुआ।