
चन्दौली(बबुरी)- मां बागेश्वरी देवी के प्रांगण में चल रहे श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के 26वें सोपान का सप्तम दिवस गुरुवार को भक्ति के साथ-साथ सामाजिक चेतना का भी दिन रहा। व्यास पीठ से कथा व्यास पंडित कमोद मिश्र शास्त्री जी ने समाज में फैले विभिन्न प्रकार के “मनमुखी धर्म” यानी कुधर्म पर सीधा प्रहार किया और सनातन मर्यादा की रक्षा का आह्वान किया।
व्यास जी ने शिव चर्चा, ईश्वर पूजा और ब्रह्माकुमारी पर टिप्पणी करते हुए कहा “जिन्हें राम प्रिया ना हो, उन्हें चाहे वो कितने भी नजदीकी हों, त्याग देना ही उचित है। भक्ति का आधार राम-कृष्ण ही हैं”। उन्होंने कहा कि कुछ लोग “शिव चर्चा” करते हैं पर शिव के बिना सर की पूजा करते हैं और कहते हैं कि शिव प्राप्त होंगे। व्यास जी ने सवाल उठाया “बिना सर की पूजा से शिव कैसे प्राप्त होंगे? सनातन धर्म में खंडित विग्रह की पूजा नहीं की जाती। विग्रह अखंड होना चाहिए, तभी पूजा पूर्ण मानी जाएगी”।
कथा में पौंड्रक कथा सुनाते हुए व्यास जी ने बताया कि कैसे पौंड्रक नामक राजा ने खुद को कृष्ण बताकर द्वारिका पर हमला किया था। भगवान ने उसका वध कर ये संदेश दिया कि “नकली भगवान बनने वालों का अंत निश्चित है”।

इसके बाद राजा परीक्षित और कलिकाल के संवाद का प्रसंग आया। व्यास जी ने बताया कि कलिकाल ने परीक्षित से रहने के लिए चार स्थान मांगे – जहां जुआ खेला जाए, जहां व्यभिचारी स्त्रियां हों, जहां मदिरा पान हो और जहां जीव हत्या हो। कलिकाल ने स्वर्ण को भी अपना पांचवां स्थान मांग लिया। व्यास जी ने चेताया कि “आज समाज में ये चारों चीजें बढ़ रही हैं। । इनसे बचो, तभी जीवन का उद्धार होगा”।
कथा में उद्धव संवाद का वर्णन करते हुए व्यास जी ने ज्ञान और भक्ति का समन्वय समझाया। उन्होंने कहा कि “ज्ञान से मोक्ष मिलता है, पर भक्ति से भगवान मिलते हैं। उद्धव ज्ञानी थे, पर गोपियों की भक्ति देखकर वो भी प्रेम में डूब गए”। शिशुपाल वध की कथा सुनाकर व्यास जी ने बताया कि भगवान 100 गालियां सहते हैं, पर 101वीं पर सुदर्शन चला देते हैं। “सहनशीलता की भी सीमा होती है। अधर्मी को समय पर दंड देना ही धर्म है”। कथा के विश्राम पर व्यास जी ने सामाजिक संदेश दिया कि जीव हत्या, व्यभिचार, जुआ और नशे से बचकर ही मनुष्य अपना उद्धार कर सकता है। संचालन कृष्ण कुमार पाण्डेय ने किया।