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असली अस्पताल के नकली डाक्टर, जीवन रक्षक या भक्षक!

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चन्दौली- (महेंद्र प्रजापति)-जनपद में स्वास्थ्य विभाग की कृपा दृष्टि से सैकड़ो छोटे बड़े अस्पताल,क्लिनिक व डायग्नोसिस सेंटर संचालित हैं जहाँ अक्सर मरीजों के जिंदगी से खिलवाड़ की शिकायतें आती रहती हैं।अकेले अलीनगर क्षेत्र में कई दर्जन अस्पतालों व क्लिनिक को स्वास्थ्य महकमे ने लाइसेंस दे रखा है वही ग्रामीण अंचलों में बिना लाइसेंस झोला छाप कंपाउंडर खुद को डॉक्टर बताते देखे जाते हैं।

देखा जाय तो हर अस्पताल में दर्जन भर डिग्रीधारी चिकित्सको का बोर्ड लगा होता है।लेकिन क्या वे अस्पताल में उपलब्ध रहते हैं तो औचक निरीक्षण करने पर सभी अनुपस्थित मिलेंगे। दरअसल अस्पताल के रजिस्ट्रेशन के लिए तय मानक के अनुसार डिग्री वालो से डिग्री का सालाना पैकेज रेट तय होता है और वे अन्यत्र अस्पताल चला रहे होते हैं और जानलेवा कथित डाक्टर साहब कभी तौलिया तो कभी कैची पेट मे भूल जाते हैं।कुछ तो एनेस्थीसिया डॉक्टर का भी खर्चा बचाने के लिए खुद ही शुरू हो जाते है। नजर डाले तो कोई टीवी बनाते बनाते डाक्टर साहब हो गया तो कोई कंपाउंडर का काम करते करते डाक्टर ही नही बल्कि अपने अस्पताल का एमडी भी बन गया। ज्यादातर संचालक बिना डिग्री के मिलेंगे जिन्होंने डिग्रीवालो को हायर किया और इलाज खुद करते है। ऐसे में असली अस्पतालों के नकली डॉक्टरों को भगवान कहे या यमराज ये बड़ा सवाल है।

दरअसल ये सारा खेल शुरू होता है एक नेक्सस के जरिये जिसके द्वारा सत्ता और विभाग में अच्छी पकड़ बना कर झोला छाप से लेकर सभी मानक विहीन अस्पताल संचालको को संरक्षण दिया जाता है। इनकी कार्य प्रणाली का पहला पिलर है एरिया मैनेजर। इनके जिम्मे शहरी,ग्रामीण व आसपास के जिलों के झोलाछाप डॉक्टरों को अपने अस्पताल में केस रेफर करने के लिए प्रोमोट किया जाता है साथ ही भारी भरकम कमीशन की पेशकश भी की जाती है।इन एरिया मैनेजर को वाहन खर्च से लेकर मोटी सैलरी और सम्मान में चिकित्सक के समकक्ष दर्जा दिया जाता है।ये अस्पताल में एमडी के बाद दूसरा ओहदा रखते हैं।

दूसरा पिलर होते है सिंडिकेट के अस्पताल से थोड़े कम सुविधाओ वाले अस्पताल। इन्हें एरिया मैनेजर की जरूरत नही होती बस इनके एजेंट गली मोहल्लों और गावो में घूमकर झोलाछापो को अपने अस्पताल का पैड, कैलेंडर स्टेशनरी इत्यादि देकर उन्हें इमरजेंसी पेशेंट भेजने और कमीशन का लालच देते है।ऐसे अस्पताल के संचालक सिंडिकेट से सीधा संबंध रखते हैं और इनके प्रोत्साहन के लिए वर्ष भर में एक दो बार भव्य पार्टी का आयोजन होता है जहाँ किसी सत्ताधारी मंत्री को मुख्य अतिथि बनाया जाता है ताकि सरकारी मशीनरी इर्द गिर्द मडराने को मजबूर रहे और भौकाल टाइट रहे।

तीसरा पिलर कुछ चपल व वाकपटु का समूह जो केस बिगड़ने व पब्लिक के हंगामे चक्काजाम की स्थिति में संबंधित थानों के अफसरों के साथ मण्डवाली कराने में महारथ हासिल किए हो।ये अक्सर थानों के इर्द गिर्द बिना काम के भी दिखते रहते और समय समय पर चाय पानी के बहाने एक शिष्टाचार मुलाकात कर सोशल मीडिया पर तस्वीरे भी लगाते रहते है।संकट की घड़ी में सरगना के लिए ये संकट मोचन की भूमिका निभाते है।

चौथा पिलर सीएमओ कार्यालय का वह बाबू होता है “होत न आज्ञा बिन पैसा रे” ये बिना कुछ लिए दिए क्लिनिक व हॉस्पिटल का रिन्युअल भी नही करता। बिना मौके पर गए ये बाबू अच्छी कमीशन लेकर अस्पताल को पास करने में महारथ हासिल किये होते है और अधिकारियों के जांच से पूर्व वफादारी निभाते हुए उन संचालको को सूचना भी पहुचा कर सचेत करते रहते हैं।

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